देश के केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बेटे निखिल गडकरी की कंपनी Cian Agro Industries & Infrastructure Ltd. ने एक साल के भीतर ऐसा वित्तीय छलांग लगाई है, जिसने पूरे कॉर्पोरेट जगत को चौंका दिया है।

📈 FY 2024–25 में रिकॉर्ड तोड़ ग्रोथ

सालाना टर्नओवर: FY 2023–24 में कंपनी की कुल बिक्री जहां सिर्फ ₹170.71 करोड़ थी, वहीं FY 2024–25 में यह बढ़कर सीधे ₹1,029 करोड़ पहुंच गई — यानी 503% की वृद्धि

शुद्ध लाभ (Net Profit): इसी अवधि में शुद्ध मुनाफा ₹4.90 करोड़ से बढ़कर ₹41.16 करोड़ हो गया, जो कि 740% से अधिक का उछाल दर्शाता है।

जून 2025 तिमाही में कंपनी का नेट प्रॉफिट ₹0.10 करोड़ से बढ़कर ₹52.21 करोड़ हो गया — यह 52,110% की वृद्धि दर्शाता है।

✅ स्रोत: Business Standard, Capital Market, Moneycontrol

🏭 Cian Agro करता क्या है?

Cian Agro Industries, निखिल गडकरी द्वारा संचालित, एथनॉल उत्पादन, शुगर प्रोसेसिंग, और एग्रो-इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काम करती है। कंपनी की संरचना और टर्नओवर में अचानक आई यह तेजी अब राजनीतिक और नीति-निर्माण के हलकों में चर्चा का विषय बन गई है।

🏛️ क्या सरकार की नीति ने दी उड़ान?

मोदी सरकार ने हाल ही में पेट्रोल में 20% एथनॉल मिश्रण (E20 policy) अनिवार्य किया है। इस नीति को आगे बढ़ाने में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की प्रमुख भूमिका रही है। संयोग से, उनके बेटे की कंपनी वही उत्पाद बनाती है — यानी एथनॉल

अब सवाल यह उठ रहा है:

क्या यह ग्रोथ सरकारी नीति का सीधा फायदा है?

क्या नितिन गडकरी ने हितों का टकराव (Conflict of Interest) नहीं किया?

क्या एक मंत्री के बेटे को ऐसी नीतियों से अप्रत्यक्ष लाभ मिलना नीतिगत नैतिकता (Ethical Governance) के खिलाफ नहीं है?

💬 जनता और सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाएं

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं:

“सरकार नीति बनाती है, और उसका फायदा मंत्री जी के बेटे को मिलता है – यह नया इंडिया है क्या?” — एक ट्विटर यूज़र

“गडकरी जी ईमानदार कहे जाते हैं, पर क्या यह सब बिना आशीर्वाद के संभव है?” — फेसबुक पोस्ट

🔍 निष्कर्ष

Cian Agro की विस्फोटक ग्रोथ आंकड़ों के लिहाज़ से भले ही बिज़नेस सक्सेस लगे, लेकिन जब कंपनी का संचालन देश के वरिष्ठ मंत्री के बेटे के हाथ में हो, और वही मंत्री उस उत्पाद (एथनॉल) को बढ़ावा देने वाली नीति के पीछे हो — तब यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह क्रोनी कैपिटलिज्म (सत्ताधारी की निकटता से आर्थिक लाभ) का उदाहरण नहीं है?

अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इस मुद्दे पर कोई सफाई देती है या मीडिया, विपक्ष और जनता इस पर और दबाव बनाएंगे।